Tattvamasi (Chhandogya) and Aham Brahmasmi (Brhadaranyaka) are of the Upanishads.  These verses teach the unity of Jiva-Brahman. The occurrence of these passages is very extensive in Advaita Darshana. So much so that these verses have a worldwide reputation as representatives of Advaita philosophy.  

These two sentences are quoted many times in Shankara’s Prasthanatraya Bhashya. Tattvamasi is quoted verbatim in the Bhashya more than a hundred times. And many times this sentence is paraphrased.  Aham Brahmasmi is mentioned more than thirty times verbally and many times paraphrased.

The occurrence of these two sentences is numerous in the prakarana texts of Shankara and in the commentaries of others on these and in the Advaita works of others.

Example of the verbatim quote:

न हि जीवो नामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः, ‘तत्त्वमसि’ ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । Brahmasutra Commentary 1.1.31.
[The Jeeva is not any different from Bramhan as taught in the passages tattvamasi and aham brahma asmi.]

Examples of citing implicitly:
1. यदा तु देहेन्द्रियमनोबुद्धिसङ्घाताद्व्युत्थाप्य श्रुत्या प्रतिबोध्यते नासि त्वं देहेन्द्रियमनोबुद्धिसङ्घातः, नासि संसारी — किं तर्हि ? — तद्यत्सत्यं स आत्मा चैतन्यमात्रस्वरूपस्तत्त्वमसीति ; तदा कूटस्थनित्यदृक्स्वरूपमात्मानं प्रतिबुध्य अस्माच्छरीराद्यभिमानात्समुत्तिष्ठन् स एव कूटस्थनित्यदृक्स्वरूप आत्मा भवति — ‘स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति’ (मु. उ. ३ । २ । ९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । तदेव चास्य पारमार्थिकं स्वरूपम् , येन शरीरात्समुत्थाय स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते ।  Brahma Sutra Bhashya 1.3.19
[You are not the body mind complex but you are that pure consciousness.]

2. पूर्वसिद्धकर्तृत्वभोक्तृत्वविपरीतं हि त्रिष्वपि कालेष्वकर्तृत्वाभोक्तृत्वस्वरूपं ब्रह्माहमस्मि, नेतः पूर्वमपि कर्ता भोक्ता वा अहमासम् , नेदानीम् , नापि भविष्यत्काले — इति ब्रह्मविदवगच्छति ; एवमेव च मोक्ष उपपद्यते
Brahmasutra Commentary 1.4.13

[Contrary to the previous thinking that I am doer-enjoyer, in all the three periods of time I am Brahman that is neither doer nor enjoyer. Before I was not doer-enjoyer, nor now, nor even in the future will I be doer-enjoyer – such is the realization of a Knower. BSB 4.1.23.]

It is important to note that these two sentences in Advaita are neither tortured or cause pain. The words tat tvam asi and aham brahma asmi do not undergo any distortion or modification in Advaita. So these words are not abused. And because these words / sentences convey the meaning so harmoniously in Advaita, they do not cause torture in the process of explaining these sentences.

Thus, in the Advaita Darshana these Upanishadic passages attain a unique eminence.

Om Tat Sat

शिक्षाप्रद नीतिकथाएँ

25 जून 2022 को बेंगलुरु में परमपूज्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य

अनन्तश्री-विभूषित विधुशेखर भारती महास्वामी जी द्वारा विमोचित नई पुस्तक

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क्या सुख के इच्छुक के लिए गुरु की आवश्यकता अनिवार्य है? किस प्रकार के शिक्षकों से बचना चाहिए? अदृश्य होते हुए भी क्या ईश्वर का अस्तित्व है? भगवान का न्याय कैसे निर्दोष है? क्या भगवान राम द्वारा वाली का वध उचित था? चित्तशुद्धि, विनम्रता, आत्म-नियन्त्रण व आस्था की क्या आवश्यकता है? गृहस्थ का आचरण कैसा होना चाहिए? ममत्व कैसे शान्ति का विध्वंसक है? क्या जगत् भ्रमात्मक है? ब्रह्मज्ञानी के क्या लक्षण हैं?’ – इत्यादि अनेक मूलभूत प्रश्नों के निश्चयात्मक विधि से उत्तर दिए गए हैं। ‘कामवासना, लालसा तथा क्रोध की हानिकारिता’, ‘सत्यशीलता के सूक्ष्म पहलू’, ‘धर्मान्तरण की विसङ्गति’, ‘भक्तिमार्ग पर कोई भी चल सकता है’, ‘हमारी कमियों के होते हुए भी अगर हम भगवान की शरण लेते हैं, तो भगवान हमें स्वीकार करते हैं’, ‘मूर्ति पूजा पर आलोक’, ‘भाग्य और मानव-प्रयत्न की परिधि’ – जैसे महत्वपूर्ण विषयों की व्याख्या की गई है।

श्री शृङ्गेरी शारदा पीठ के 35वें पीठाधीश्वर परमपूज्य जगद्गुरु शङ्कराचार्य अनन्तश्री-विभूषित अभिनव विद्यातीर्थ महास्वामी जी (गुरुजी), अपनी 19 वर्ष की आयु पूरी करने से पूर्व ही जीवन्मुक्ति (जीवित रहते हुए संसार बन्धन से मुक्ति) प्राप्त करके, परब्रह्म में प्रतिष्ठित रहे। गुरुजी ने कहानियों के माध्यम से, अति जटिल आध्यात्मिक तत्त्वों को भी, चित्ताकर्षक शैली में ऐसे अनायास प्रस्तुत किया है कि लोग उन्हें सरलता से और समग्र रूप से समझ सकें। गुरुजी की ‘शिक्षाप्रद नीतिकथाएँ’ 98 शीर्षकों के अन्तर्गत इस ग्रन्थ में सम्मिलित हैं।

अनुवादक — श्री दिव्यसानु पाण्डेय | 288 पृष्ठ | रु. 100

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Posted by: adbhutam | June 27, 2022

Emptiness of relationships – Padmapurana

Emptiness of relationships

In this chapter of the Padma Purana, some of these verses convey the fragility of attachment:

पद्मपुराणम्/खण्डः ५ (पातालखण्डः)/अध्यायः ०८८
https://sa.wikisource.org/s/x6s

कस्य पुत्राः प्रिया भार्या कस्य स्वजनबांधवाः ।
कः कस्य नास्ति संसारे न संबंधो द्विजोत्तम ३०।
मायामोहेन संमूढा मानवाः पापचेतनाः ।
इदं गृहमयं पुत्र इयं भार्या ममैव हि ३१।
अनृतं दृश्यते कांत संसारस्य हि बंधनम् ३२।

Son, spouse, or any attachment has delusion for its cause.  When you search the true content of these you will find that there is no base for them. So these are said to be false. That is, the person who is supposed to be a jiva, is simply unrelated to anything.

The famous Bhaja Govindam verses say this alone:

का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोयम् अतीव विचित्रः।
कस्य त्वम् कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥ ८॥

The teaching is:  inquire as to who the son is, who the wife is , who you are and where you came from.

कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः
का मे जननी को मे तातः ।
इति परिभावय सर्वमसारम्
विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥२३॥

When contemplated, all of these are known to be akin to a dream, with no reality intrinsic to them.

Om Tat Sat


In this chapter, the Supreme Lord summarizes the order of creation and involution to say how it leads to liberation.

श्रीमद्भागवतपुराणम्/स्कन्धः ११/अध्यायः २४
https://sa.wikisource.org/s/tw3
सांख्ययोगवर्णनम् –

श्रीभगवानुवाच –
( अनुष्टुप् )
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि साङ्ख्यं पूर्वैर्विनिश्चितम् ।
यद्विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १ ॥
आसीज्ज्ञानमथो अर्थ एकमेवाविकल्पितम् ।

Creation projects multiplicity. Multiplicity becomes a fantasy, causing the delusion of reality of duality.

The experience of these pairs of opposites is nothing but samsara, bondage. There was only one principle before the creation characterized by duality.

तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम् ।
वाङ्‌मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका ।
ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४ ॥

That Non-dual principle, that is beyond mind and speech, due to Maya became two and further became many leading to the delusion of duality.

How indeed will the delusion of multiplicity end? The Lord provides the solution: contemplation of dissolution, laya, of the projected universe. That is, when we delineate how diversity resolves into the One principle, we realize the ultimate Truth, the Non-dual principle, that alone remains over.

अन्ने प्रलीयते मर्त्यं अन्नं धानासु लीयते ।
धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे ।
लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते ॥ २३ ॥
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे ।
अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु ॥ २४ ॥
योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे ।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥
स लीयते महान् स्वेषु गुणेशु गुणवत्तमः ।
तेऽव्यक्ते संप्रलीयन्ते तत्काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे ।
आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥

Creation is nothing but the cause transforming itself into the effect. Laya, dissolution, is the involution of the projection into its causal principle. The Supreme Lord’s teaching is that when we contemplate upon the concept of creation from the One and its involution into that One, we transcend the delusion of duality.

एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः ।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः ॥ २८ ॥
एष साङ्ख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः ।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया ॥ २९ ॥

When we contemplate upon the creation and involution, like the darkness disappearing at sunrise, the darkness of delusion ends.

This reminds one of this important mantra of the Mundaka Upanishad:

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ९ ॥ 2.1.9

When the realization of subjectivity happens the chidachid granthi (ignorance and its effect), all doubts are destroyed and karma becomes ineffective. He is free from the delusion of samsara.

Gowdapada has summarized the purport of the creation stated in the Bhagavatam thus –

मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः सृष्टिर्या चोदितान्यथा ।
उपायः सोऽवताराय नास्ति भेदः कथञ्चन ॥ १५ ॥ 3.15

The Upanishads have explained creation by giving many examples, such as clay, iron, spark, etc., only with the aim of helping us grasp the Non-dual principle, the source of creation and the abode of dissolution.
Sridhara Swamin (14th Century CE) has cited the above Gowdapada verse in his commentary to this chapter of the Bhagavatam. 

This is what we see in this chapter of the Bhagavatam on the process of creation – involution. The Lord himself has said the result of such a contemplation, liberation.

The concept of creation and involution of the projection can be found in the Advaita texts:

These verses in the Brahmanuchintanam by Shankaracharya, convey the order of creation and its opposite, involution:

https://sanskritdocuments.org/doc…/brahmaanucintanam.html

आकाशाद्वायुरुत्पन्नो वायोस्तेजस्ततः पयः ।
अद्भ्यश्च पृथिवी जाता ततो व्रीहियवादिकम् ॥ ११॥
पृथिव्यप्सु पयो वह्नौ वह्निर्वायौ नभस्यसौ ।
नभोऽप्यव्याकृते तच्च शुद्धे शुद्धोऽस्म्यहं हरिः ॥ १२॥

A verse from the text ‘Atma vidya vilasa’ by Sri Sadashiva Brahmendra:
https://sanskritdocuments.org/doc_z…/AtmavidyAvilAsa.html
जनिविपरीतक्रमतो बुद्ध्या प्रविलाप्य पञ्चभूतानि ।
परिशिष्टमात्मतत्त्वं पश्यन्नास्ते मुनिः शान्तः ॥ ११॥

Thus this short chapter of the Bhagavatam conveys a very great message, that of the means to liberation.

Om Tat Sat 

Posted by: adbhutam | June 17, 2022

The Vedantic Abhilasha-ashTakam in the Skanda puranam

स्कन्दपुराणम्/खण्डः ४ (काशीखण्डः)/अध्यायः ०१०
https://sa.wikisource.org/s/fun

Here is an English translation:
https://www.shastras.com/shiva-stotras/santhathi-abhilasha-ashtakam/

विश्वानर उवाच ।। ।।

एक ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किंचित् ।।
एको रुद्रो न द्वितीयोवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम् ।। २६ ।।

Here we find some unmistakable references to some Upanishadic passages.
एक ब्रह्मैवाद्वितीयं is a reference to the popular Chandogya 6.2.1 passage: सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।

नेह नानास्ति किंचित् – Brihadaranyaka Upanishad ‘नेह नानास्ति किञ्चन’ (बृ. उ. ४ । ४ । १९)

एको रुद्रो न द्वितीयोवतस्थे – Shvetashvataropanishad: एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य 3.2

एकः कर्ता त्वं हि सर्वस्य शंभो नानारूपेष्वेकरूपोऽस्य रूपः ।।
यद्वत्प्रत्यप्स्वर्क एकोप्यनेकस्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये ।।२७।।

नानारूपेष्वेकरूपोऽस्य – Kathopanishad 2.5.12 एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

‘एको देवो बहुधा सन्निविष्टः’ (तै. आ. ३ । १४ । १) ‘एकः सन्बहुधा विचार’ (तै. आ. ३ । ११ । १) ‘त्वमेकोऽसि बहूननुप्रविष्टः’ (तै. आ. ३ । १४ । १३) ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा’ (श्वे. ६ । ११)

रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रूप्यं नैरःपूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ ।।
यद्वत्तद्वद्विष्वगेष प्रपंचो यस्मिञ्ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम् ।। २८ ।।

The three analogies: snake in a rope, silver in shell and water in mirage – when the knowledge of the Supreme arises, the world will be known to be a superimposition.

यथा शुक्तिकायां रजताभावं पश्यति ; तदुच्यते ब्रह्मैव अर्पणमिति, यथा यद्रजतं तत् शुक्तिकैवेति । Gita bhashya 4.24 shell-silver.

न हि निरास्पदा रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादयः क्वचिदुपलभ्यन्ते केनचित् । Mandukya karika bhashya: 1.6 There is no superimpostion without a substratum.

A few years ago, there was a seminar on Buddhism, organised jointly by the Maha Bodhi Society and the Karnataka Sanskrit University, at the Institute of World Culture, B.P. Wadia Road, Basavanagudi, Bangalore. Speaking at the seminar, senior scholar Dr. D. Prahladachar (who is now the head of the Vyasraja Matha) observed: “Both Buddhists and Advaitins admit the mithyatva of the world. The Advaitins say the substraturm of the world, which is but a superimposition, is Brahman as propounded by Vedanta. Buddhists do not admit any eternal substratum.”

तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः ।।
पुष्पे गंधो दुग्धमध्येपि सर्पिर्यत्तच्छंभो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये ।। २९ ।।

शब्दं गृण्हासि अश्रवाः त्वं हि जिघ्रेः अघ्राणः त्वं व्यंघ्रिः आयासि दूरात् ।
व्यक्षः पश्येः त्वं रसज्ञोऽपि अजिह्वः कः त्वां सम्यक् वेत्ति अतः त्वां प्रपद्ये ॥ 30॥

नो वेदस्त्वामीश साक्षाद्धि वेदनो वा विष्णुर्नो विधाताऽखिलस्य ।।
नो योगींद्रा नेंद्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये ।। ३१ ।।
नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्यानो वा रूपं नैव शीलं न देशः ।।
इत्थंभूतोपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान्कामान्पूरयेस्तद्भजे त्वाम् ।। ३२ ।।
त्वत्तः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशांतः ।।
त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत्किंनास्यतस्त्वां नतोस्मि ।। ३३ ।।

Here we see the Shvetashvataropanishat 4.3 paraphrased: त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं –

त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥

Thou art the woman and Thou the man; Thou art a boy and again a young virgin; Thou art yonder worn and aged man that walkest bent with thy staff. Lo, Thou becomest born and the world is full of thy faces.

With this verse, the Abhilasha-ashTakam is over. The rest of the following verses is the signing off of the event in the Skanda Puranam:

स्तुत्वेति भूमौ निपपात विप्रः स दंडवद्यावदतीव हृष्टः ।।
तावत्स बालोखिलवृद्धवृद्धः प्रोवाच भूदेव वरं वृणीहि ।। ३४ ।।
तत उत्थाय हृष्टात्मा मुनिर्विश्वानरः कृती ।।
प्रत्यब्रवीत्किमज्ञातं सर्वज्ञस्य तव प्रभो ।। ३५ ।।
सर्वांतरात्मा भगवान्सर्वः सर्वप्रदो भवान् ।।
याच्ञां प्रतिनियुंक्ते मां किमीशो दैन्यकारिणीम् ।। ३६ ।।
इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवो विश्वानरस्य ह ।।
शुचेः शुचिव्रतस्याशु शुचिस्मित्वाब्रवीच्छिशुः ।। ३७ ।।

बाल उवाच ।।

त्वया शुचे शुचिष्मत्यां योभिलाषः कृतो हृदि ।।
अचिरेणैवकालेन स भविष्यत्यसंशयः ।। ३८ ।।
तव पुत्रत्वमेष्यामि शुचिष्मत्यां महामते ।।
ख्यातो गृहपतिर्नाम्ना शुचिः सर्वामरप्रियः ।। ३९ ।।
अभिलाषाष्टकं पुण्यं स्तोत्रमेतत्त्वयेरितम् ।।
अब्दं त्रिकालपठनात्कामदं शिवसंनिधौ ।। 4.1.10.१४० ।।
एतत्स्तोत्रस्य पठनं पुत्र पौत्र धनप्रदम् ।।
सर्वशांतिकरं चापि सर्वापत्परिनाशनम् ।। ४१ ।।
स्वर्गापवर्ग संपत्तिकारकं नात्र संशयः ।।
प्रातरुत्थाय सुस्नातो लिंगमभ्यर्च्य शांभवम् ।। ४२ ।।
वर्षं जपन्निदं स्तोत्रमपुत्रः पुत्रवान्भवेत् ।।
वैशाखे कार्तिके माघे विशेषनियमैर्युतः ।। ४३ ।।
यः पठेत्स्नानसमये स लभेत्सकलं फलम् ।।
कार्तिकस्य तु मासस्य प्रसादादहमव्ययः ।। ४४ ।।
तव पुत्रत्वमेष्यामि यस्त्वन्यस्तत्पठिष्यति ।।
अभिलाषाष्टकमिदं न देयं यस्य कस्यचित् ।। ४५ ।।
गोपनीयं प्रयत्नेन महावंध्याप्रसूतिकृत् ।।
स्त्रिया वा पुरुषेणापि नियमाल्लिंगसंनिधौ ।। ४६ ।।
अब्दं जप्तमिदं स्तोत्रं पुत्रदं नात्र संशयः ।।
इत्युक्त्वांतर्दधे बालः सोपि विप्रो गृहं गतः ।। १४७ ।।

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्यां संहितायां चतुर्थे काशीखण्डे पूवार्द्धे इंद्राग्निलोकवर्णनंनाम दशमोऽध्यायः ।। १० ।।

Om Tat Sat

Certain special aspects can be found in the ‘Prayaschitta kAnda’ of the Yajnavalkya Smriti.

Shankaracharya has quoted the Yajnavalkya Smriti as a reference in the Sanat Sujatiya Bhashya on the topic: Brahman alone appearing as the jiva.

Some passages from this Smriti:

याज्ञवल्क्यस्मृतिः/प्रायश्चित्ताध्यायः/यतिधर्मप्रकरणम्
https://sa.wikisource.org/s/3ob

निमित्तं अक्षरः कर्ता बोद्धा ब्रह्म गुणी वशी ।
अजः शरीरग्रहणात्स जात इति कीर्त्यते । । ३.६९ । ।

Brahman, who has no birth in reality, comes to be a jiva owing to associating with the body. This is the same Brahman that the Upanishads specify as the cause of the world.

The verses in between here remind one of the scheme in the Purusha suktam.
अनादिरात्मा संभूतिर्विद्यते नान्तरात्मनः ।
समवायी तु पुरुषो मोहेच्छाद्वेषकर्मजः । । ३.१२५ । ।

Even though there is no actual birth, the soul (Brahman) is born owing to desire, etc. This is reminiscent of the Nrisimha Tapini Upanishad:

स वा एष भूतानीन्द्रियाणि विराजं देवताः कोशांश्च सृष्ट्वा प्रविश्यामूढो मूढ इव व्यवहरन्नास्ते माययैव तस्मादद्वय एवायमात्मा सन्मात्रो नित्यः शुद्धो बुद्धः सत्यो मुक्तो निरञ्जनो विभुरद्वयानन्दः परः प्रत्यगेकरसः प्रमाणैरेतैरवगतः सत्तामात्रं हीदं सर्वं सदेव पुरस्तात्सिद्धं हि ब्रह्म…

This Upanishad states that ‘Brahman, the Creator of the universe, though not deluded appears as though deluded. This sentence of the Upanishad is cited by Sayanacharya in the Purusha Suktam while commenting on the passage: ‘ 

सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरः नामानि कृत्वा अभिवदन् यदास्ते ..’
यद्येवं स कथं ब्रह्मन्पापयोनिषु जायते ।
ईश्वरः स कथं भावैरनिष्टैः संप्रयुज्यते । । ३.१२९ । ।

In this Yajnavalkya Smriti, it has been deliberated as to how Brahman comes to take birth even though it is pure.

This verse is quoted by Shankara in the Sanatsujatiya Bhashya.

आकाशं एकं हि यथा घटादिषु पृथग्भवेत् ।
तथात्मा एको ह्यनेकश्च जलाधारेष्विवांशुमान् । । ३.१४४ । ।

The Smriti says  the One only soul (Brahman) seems to take many forms just as the same one-only ether is spoken of to be many owing to limiting adjuncts, upadhis. This analogy is most famous in Advaita.

अनादिरादिमांश्चैव स एव पुरुषः परः ।
लिङ्गेन्द्रियग्राह्यरूपः सविकार उदाहृतः । । ३.१८३ । ।

One Supreme Brahman, without any beginning, appears to be transformed into many bodies.
अहंकारः स्मृतिर्मेधा द्वेषो बुद्धिः सुखं धृतिः ।
इन्द्रियान्तरसंचार इच्छा धारणजीविते । । ३.१७४ । ।
स्वर्गः स्वप्नश्च भावानां प्रेरणं मनसो गतिः ।
निमेषश्चेतना यत्न आदानं पाञ्चभौतिकम् । । ३.१७५ । ।
यत एतानि दृश्यन्ते लिङ्गानि परमात्मनः ।
तस्मादस्ति परो देहादात्मा सर्वग ईश्वरः । । ३.१७६ । ।
बुद्धीन्द्रियाणि सार्थानि मनः कर्मेन्द्रियाणि च ।
अहंकारश्च बुद्धिश्च पृथिव्यादीनि चैव हि । । ३.१७७ । ।
अव्यक्तं आत्मा क्षेत्रज्ञः क्षेत्रस्यास्य निगद्यते ।
ईश्रवः सर्वभूतस्थः सन्नसन्सदसच्च यः । । ३.१७८ । ।

In the above verses it is said that there is a Consciousness which is different from the body. This is the Sentient being that illuminates the entire  not-self and is present in all bodies. This is the subject of chapter 13 of the Bhagavad Gita. 

Thus, the Yajnavalkya Smriti accepts only one principle which is different from the body. This is the true nature of the Atman in Advaita.

Thus many doctrinal aspects of Advaita can be found in this  Yajnavalkya Smriti that belongs to very ancient times.
Om Tat Sat

हरिवंशपुराणम्/पर्व २ (विष्णुपर्व)/अध्यायः १२५

https://sa.wikisource.org/s/1coh

https://sa.wikisource.org/s/1coh

This chapter consists an enchanting Stuti of the identity of Hari Hara and Brahma by Markandeya. There are many interesting aspects in this Stuti. And English translation can be found here:

 on pages 790 last paragraph onwards.

To read the stuti in its original gives great joy.   

ಮಹೇಂದ್ರ ಸೋಮಯಾಜಿ ತಮ್ಮ ಒಂದು ಲೇಖನದಲ್ಲಿ ಅದ್ವೈತ ಅವೈದಿಕ ಮತ ಎಂಬುದನ್ನು ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಲು ವಾದಕ್ಕೆ ಕರೆ ಕೊಟ್ಟಿದ್ದರು. ಇದಕ್ಕೆ ಧಾರವಾಡದ ಶ್ರೀ ಜಿ. ಆರ್. ಪಾಟೀಲ ಅವರು ಈ ಲೇಖನದಲ್ಲಿ ತಮ್ಮ ಅಭಿಪ್ರಾಯವನ್ನು ತಿಳಿಸಿದ್ದಾರೆ:

Posted by: adbhutam | May 17, 2022

The Kurma Purana quoted by Shankara

Shankara has quoted some verses of the Kurma Purana in his Sanat Sujatiya Bhashya / commentary. In these verses lies the pulp of Brahman Knowledge. When reading these verses, we are naturally reminded of the Brahma sutra-bhashya and other sentences.

In Advaita alone the jiva realizes himself to be Brahman. That Knowledge itself is Moksha is admitted only in Advaita. These doctrinal points can be seen in the Karma Purana cited by Shankara. In other systems going to a different world/loka alone means liberation.

Shankara says in his Sanat Sujatiya commentary that in this Purana, these are stated by ‘Parameshwara.’ The word ‘Parameshwara’ is also found in this Purana/chapter.

देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः ॥ ३९.१४
कूर्मपुराणम्-उत्तरभागः/नवत्रिंशत्तमोऽध्यायः
https://sa.wikisource.org/s/43h
ज्ञानं तु केवलं सम्यगपवर्गफलप्रदम् ॥ ३९.४५
विहाय सांख्यं विमलमकुर्वत परिश्रमम् ॥ ३९.४६
तस्माद् भवद्भिर्विमलं ज्ञानं कैवल्यसाधनम् ।
ज्ञातव्यं हि प्रयत्नेन श्रोतव्यं दृश्यमेव च ॥ ३९.४८
एकः सर्वत्रगो ह्यात्मा केवलश्चितिमात्रकः ।
आनन्दो निर्मलो नित्यं स्यादेतत् सांख्यदर्शनम् ॥ ३९.४९
एतदेव परं ज्ञानमेष मोक्षोऽत्र गीयते ।
एतत् कैवल्यममलं ब्रह्मभावश्च वर्णितः ॥ ३९.५०
आश्रित्य चैतत् परमं तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
पश्यन्ति मां महात्मानो यतयो विश्वमीश्वरम् ॥ ३९.५१

Shankara Bhashya passages that correspond to the doctrinal point above:

ब्रह्मभावश्च मोक्षः । (तत्तु समन्वयात् भाष्यम्)
ब्रह्मभावाच्चान्यत्राशरीरतानुपपत्तेः ;
‘स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो’ इति च शारीरस्य ब्रह्मभावोपदेशात्
तस्य तु वाक्यशेषेण ‘तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म’ इति जीवभावं व्यावर्त्य ब्रह्मभाव उपदिश्यते — ‘तत्त्वमसि’ (छा. उ. ६ । ९ । ४)
ब्रह्मविद्याकार्यस्य ब्रह्मभावस्य
अत्र अस्मिन्नेव शरीरे वर्तमानः ब्रह्म समश्नुते, ब्रह्मभावं मोक्षं प्रतिपद्यत इत्यर्थः ।

In this chapter, the Purana cites the Atharva Shira Upanishad:

वैदिकैर्विविधैर्मन्त्रैः सूक्तैर्माहेश्वरैः शुभैः ।
अथर्वशिरसा चान्ये रुद्राद्यैरर्च्चयन्भवम् ॥ ३९.२०

This Upanishad states that Pashupata Yoga involves the practice of bhasma dharana. The term ‘bhasma’ occurs in this chapter of the Purana multiple times.

There are many important doctrinal points in this Purana that are unfavorable to other systems but correspond only to Advaita.

अथर्वशिरोपनिषत् –
https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/atharvashira.html

अग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्म सर्वंह वा इदं भस्म मन एतानि चक्षूंषि यस्माद्व्रतमिदं पाशुपतं यद्भस्म नाङ्गानि संस्पृशेत्तस्माद्ब्रह्म तदेतत्पाशुपतं पशुपाशविमोक्षणाय ॥ ५॥

Om Tat Sat
Image: Avatar of Lord Shiva as a Beggar in the Daruka vana:

Here is a short article, in English, giving the citations:

Click to access eng-vsn-bh-citations-from-puranas.pdf

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